भाजपा सांसद का नाम सैक्स स्कैंडल में

बिहार के हाई-प्रोफाइल सेक्स स्कैंडल केस में अब बीजेपी सांसद छेदी पासवान का नाम भी जुड़ गया है। इस मामले में जो पीड़िता हैं वह छेदी पासवान के बेटे राहुल पासवान के नाम पर रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर को इस्तेमाल कर रही थी।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इस बात की पुष्टि अदालत में पेश की गई केस डायरी से हुई है। इस केस डायरी ने पीड़िता द्वारा पुलिस में दर्ज कराई गई एफआईआर पर सवाल खड़े कर दिए हैं। केस डायरी के मुताबिक, 2 मार्च 2016 को तड़के 3 बजकर 19 मिनट 17 सेकेंड पर पहली बार पीड़िता के नंबर से निखिल के मोबाइल पर एसएमएस आया था।
इसके कुछ देर बाद ही करीब 3 बजकर 22 मिनट 28 सेकेंड पर पीड़िता ने निखिल को कॉल किया और दोनों के बीच 5353 सेकेंड यानी करीब 9 मिनट तक बात हुई, पीड़िता ने एफआईआर और कोर्ट में कहा था कि जनवरी 2016 में निखिल ने उसे पहली बार मिस्ड कॉल किया था, फिर उनके बीच दोस्ती हो गई।
बता दें कि गुरुवार को पटना के पास्को कोर्ट ने आरोपी निखिल प्रियदर्शी की जमानत याचिका को खारिज कर दिया था जिसके बाद कोर्ट ने निखिल के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया है। फिलहाल, निखिल प्रियदर्शी फरार हैं और पुलिस हर राज्य में छापेमारी कर रही है।

केजरीवाल का बड़ा ऐलान, दिल्ली में अब मेडिकल टेस्ट मुफ्त

नई दिल्ली: दिल्ली में रहनेवालों के लिए केजरीवाल सरकार ने बड़ी योजना का ऐलान किया है. केजरीवाल सरकार ने बीमार लोगों के लिए दिल्ली में महंगे मेडिकल टेस्ट को मुफ्त कर दिया है.

दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार ने आज डॉक्टरों और मेडिकल टेस्ट के बिलों से परेशान दिल्ली के लोगों को बड़ी राहत देने का ऐलान किया. दिल्ली सरकार ने दिल्ली के महंगे टेस्ट मुफ्त में करने का ऐलान किया है.

अगर आप दिल्ली में रहते हैं तो आपका मुफ्त टेस्ट हो सकता है. MRI, CT स्कैन, अल्ट्रासाउंड, EEG, TMT जैसे टेस्ट मुफ्त होंगे. दिल्ली सरकार के कुल 30 अस्पताल हैं जहां आप इलाज के लिए जा सकते हैं.

इसके अलावा अगर आपको पॉलीक्लिनिक रेफर किया गया है तो आप दिल्ली के 23 पालीक्लिनिक भी जा सकते हैं. अगर अस्पताल और पॉलिक्लिनिक आपको टेस्ट के लिए कहते हैं तो दिल्ली सरकार द्वारा तय किए गए 21 लैब में आप मुफ्त टेस्ट करा सकते हैं.

दरअसल सरकार ने 1 दिसम्बर 2016 को ये योजना शुरू की थी. इसको जब इसका रिव्यू किया गया तो इनकम सर्टिफिकेट की दिक्कत आयी. ऐसे में अब टेस्ट मुफ्त करने का फैसला लिया गया.

पहले मुफ्त टेस्ट के लिए कुछ शर्तें थीं. पहले नियम था कि तीन साल से दिल्ली में रहना जरूरी था. इसके साथ ही पारिवारिक आय 3 लाख तक होना अनिवार्य था.

दिल्ली सरकार के अस्पतालों में अगर आपको ऑपरेशन की डेट 30 दिन से ज्यादा मिलती है तो ऐसे कुल 41 अस्पताल तय किए गए हैं जिनमें मरीज अपना ऑपरेशन करा सकता है. इनकी घोषणा भी एक हफ्ते में हो जाएगी. केजरीवाल सरकार का आज के कदम से उन्हें इस साल अप्रैल में होनेवाले एमसीडी चुनाव में बड़ा फायदा दिला सकता है.

गुरमेहर का बयान, बदलते सामाजिक परिवेश की कहानी हैः आशुतोष

गुरमेहर कौर के बारे में अगर कोई एक हफ्ते पहले पूछता तो सिवाय उसके परिवारवालों, दोस्तों के अलावा कोई कुछ नहीं कह पाता. लेकिन आज अगर कोई उसके बारे में पूछे तो सोशल मीडिया, टीवी, अखबार देखने पढ़ने वाला हर शख्स उसके बारे में आसानी से बता सकता है. उसके घर परिवार का पूरा ब्योरा भी दे सकता है. यहां तक कि बड़े-बड़े नामचीन भी उसके साथ और खिलाफ खड़े दिखायी पड़ेंगे.
जावेद अख्तर उसकी तरफदारी कर रहे हैं तो वीरेंद्र सहवाग उसकी हंसी उड़ा रहे हैं. देश के केंद्रीय मंत्री इशारों-इशारों में गुरमेहर को देशद्रोही करार दे रहे हैं. आज गुरमेहर के बारे में कह सकते हैं कि वो एक आम लड़की के दायरे से निकल कर एक यूथ आइकॉन बन गयी है. आप गुरमेहर से नफरत करें या फिर प्यार, लेकिन आज आप उसको नजरअंदाज नहीं कर सकते.

आवाज दबाने के प्रयास पर खड़ी हुई गुरमेहर
ये संभव है कि कुछ दिनों के बाद वो बहस से गायब हो जाये. ये भी संभव है कि उसको लेकर चर्चा होना बंद हो जाये. वो टीवी पर भी न दिखाई दे. लेकिन जिस मुद्दे की वो प्रतीक बन गई है, 21 साल की छोटी सी उम्र में वो उभरते भारत की एक नई कहानी कह रहा है.
गुरमेहर क्या है? वो एक प्रतिरोध का नाम है. रामजस कॉलेज में जब बोलने की आजादी को हिंसा के जरिये दबाने का प्रयास एबीवीपी के लोग कर रहे थे और ये लग रहा था कि ये आवाज दब जायेगी तब एक बच्ची ने प्रतिकार किया. संविधान में वर्णित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सोशल मीडिया पर लिखे कुछ शब्दों से ये बीच बहस में आ गयी.
हालांकि इस मुद्दे को भटकाने के लिये देशप्रेम को भी डाल दिया गया. लेकिन चर्चा खूब गरम है. यही तो एक आइकॉन का काम है. वो समाज में उठती प्रवृत्तियों, उम्मीदों, आशाओं, निराशाओं, परंपराओं, साहस, मानवीय संवेदनाओं के ही तो प्रतीक होते हैं.
अन्याय के खिलाफ उठती रही है आवाज
उसने वो मुद्दा उठाया जो बड़े-बड़े महारथी उठाने से डर रहे थे. या फिर कन्नी काट रहे थे. और इस संदर्भ में वो अकेली नहीं है. पिछले सालों में ये देखने में आया है कि अचानक कोई नया नायक खड़ा हो जाता है.
दो सालों का हिसाब लें तो पता चलता है कि कहीं 24 साल का हार्दिक पटेल एक बड़े तबके की लड़ाई लड़ रहा है तो कहीं 32 साल का दलित युवक जिग्नेश मेवाणी दलितों पर ढाये गये जुल्म के खिलाफ लोगों को लामबंद कर रहा है. दो साल पहले हैदराबाद में आत्महत्या करने के लिये मजबूर रोहित वेमुला दलित प्रतिरोध का प्रतीक बन गया. जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय मे कश्मीर के मसले पर जब एबीवीपी के लोगों और मीडिया के एक तबके ने पूरे विश्वविद्यालय को ही आतंकवाद का अड्डा घोषित करने की कोशिश की तो कन्हैया कुमार सामने आया.
इन सबसे काफी पहले 2011 में अन्ना हजारे एक नई राष्ट्रीय चेतना के वाहक बन गये थे. भ्रष्टाचार के खिलाफ जो आंदोलन चला उसने राष्ट्रीय विमर्श को बदलने का काम किया. उनके बाद अरविंद केजरीवाल उस चेतना को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं.
आम आदमी की राजनीतिक विमर्श को मजबूत करने की कोशिश
ये सभी लोग अपनी तरह से राजनीतिक पटल पर दखल तो दे रहे हैं, राजनीतिक बहस को जन्म दे रहे हैं या फिर बुझते हुये ज्वलंत मुद्दों को नयी आग देने का काम कर रहे हैं.
गुरमेहर हो या फिर हार्दिक या कन्हैया सबने राजनीतिक विमर्श को सशक्त करने का काम किया है लेकिन ये सभी लोग ऐसा करने के पहले प्रोफेशनल पॉलिटीशियन नहीं थे. ये किसी राजनीतिक दल में सक्रिय भी शायद नहीं थे और न ही किसी राजनीतिक दल ने इनकी पहल को प्रायोजित ही किया था. ये सभी विशुद्ध रूप से आम आदमी या आम औरत थे. जब कि भारत जैसे खांटी राजनीतिक देश में हर बहस आजादी के पहले या फिर आजादी के बाद राजनीतिक दल की कोख से निकली है. और बहस को राजनीतिक परिणति तक ले जाने का अभ्यास भी राजनीतिक दल ही कर पाये हैं.
चाहे लोहिया का पिछड़ावाद हो या फिर जेपी का आपातकाल के खिंलाफ आंदोलन. या आगे कहें बीजेपी का राम मंदिर विवाद. इन सबके पीछे पेशेवर राजनेताओं की सोच ही काम कर रही थी. लेकिन अन्ना से गुरूमेहर तक का नया सफर एकदम नया है. नेता पीछे है आम जन आगे हैं.
निराशा में डूबे लोगों के बीच आस जगाने की कोशिश
भारतीय संदर्भ से अलग-अगर देखें तो वेल घोनिम का नाम सहसा याद आता है. 25 जनवरी 2011 के पहले वो एक आम आदमी था. तीस साल का युवक. तीन महीने में ही टाइम मैगजीन ने दुनिया के सबसे प्रमुख 100 लोगों मे सबसे ऊपर घोनिम का नाम रखा.
घोनिम ने सिर्फ फेसबुक पर एक पोस्ट लिखी कि वो मौजूदा व्यवस्था से तंग आ चुका है और वो विरोध में तहरीर चौक पर बैठने जा रहा है. उसके इस कदम ने मिस्र में क्रांति ला दी. दो दशक से ज्यादा पुरानी तानाशाही व्यवस्था की चूलें हिल गईं ओर हुश्नी मुबारक की सरकार चली गयी, उन्हें जेल जाना पड़ा.
मिस्र के नेता एल बारदेई ने लिखा कि घोनिम ने निराशा में डूबी एक पूरी पीढ़ी को उम्मीद दी. मिस्र से जो क्रांति का बिगुल बजा तो पूरे मध्यपूर्व एशिया का नक्शा ही बदल गया, लोकतंत्र की नयी बयार बहने लगी. इसी तरह निराशा में डूबे फ्रांस के लोगों को उम्मीद देने का काम 1789 में चंद आम लोगों ने किया था.
जैकोबिन क्लब और उससे जुड़े लोग या फिर रोब्स पियरे जैसे लोग वकील मामूली थे. कोई नेता नहीं थे और न ही उस वक्त की राजशाही में उनका कोई दखल था. लेकिन जब राजा का आतंक बढ़ा, मंहगांई बढ़ी, लोगों का जीना दूभर हो गया तो विद्रोह की शुरुआत हुयी, राजशाही हमेशा के लिये फ्रांस में खत्म हो गयी, सामंतवाद का सफाया हो गया, पादरियों की ताकत कम हुयी और समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के सिद्धांत पर लोकतंत्र की नींव पड़ी. ईजे हाब्सबाम जैसे इतिहासकार ने लिखा कि फ्रांसिसी क्रांति ने लोगों की उम्मीदों को राजशाही से जनता की तरफ मोड़ दिया.
देश में भी सुनाई दे रही है बदलाव की आहट
तो क्या माना जाये? भारत में भी कुछ बदल रहा है? क्या बड़ी घटना के पदचाप सुनाई दे रहे हैं? क्या कुछ बड़ा घटने वाला है? बदलाव प्रकृति का नियम है. भारतीय राजनीति, पिछले कुछ सालों से समाज में जो नया परिवर्तन हो रहा है उसको प्रतिनिधित्व देने में नाकाम रही है. नई अर्थव्यवस्था और संवैधानिक ढांचे ने समाज में क्रांतिकारी बदलावों का आगाज कर दिया है. नये मध्यवर्ग के साथ-साथ पिछड़ा और दलित वर्ग अपने नये एहसासों का हिसाब और हक दोनो ही मांग रहा है.
महिलाओं में भी नयी चेतना का प्रसार काफी तेजी से हो रहा है. वो पुरुष प्रधान ढांचे के खिलाफ अपने को मजबूती से स्थापित कर रही है. लेकिन राजनेता और राजनीति दुर्भाग्य से आज भी पुरानी दुनिया में सांस ले रहे हैं. वही घिसे-पिटे लोग, वही घिसी-पिटी बातें, वही घिसे-पिटे मुद्दे. न नये की पहचान है और न ही कोई नया समाधान. सोशल मीडिया इस नये संदर्भ को नया मंच दे रहा है. आम जन वहां अपनी बात पुरजोर तरीके से रखने की कोशिश करता है. जब उसकी बात सुनी नहीं जाती है या फिर उसका मजाक उड़ाया जाता है तो विक्षोभ बढ़ता है.
सोशल मीडिया ने दी आम आदमी को ताकत
सोशल मीडिया बहुत ताकतवर हो गया है. इसकी पहुंच हर घर तक है. शहर हो या फिर गांव सब जगह इसकी धमक है. वहां खुले में बहस हो रही है. टामस फ्रीडमैन कहता है कि सन 2000 में जब हम सब सो रहे थे तब चुपके से दुनिया वैश्वीकरण के तीसरे चरण में प्रवेश कर गयी. फ्रीडमैन के मुताबिक वैश्वीकरण का पहला चरण 1492 से 1800 तक चला, दूसरा 1800 से 2000 तक, यानी इस वक्त विश्व वैश्वीकरण के तीसरे चरण के शुरुआती दौर में है.
अगर पहले दौर की खासियत देशों के बीच वैश्वीकरण की ललक थी, दूसरे दौर को बड़ी-बड़ी कंपनियां रेखांकित करती थीं तो तीसरे को व्यक्ति संचालित कर रहा है. वैश्वीकरण के इस दौर में व्यक्ति पूरे दुनिया के लोगों से साझेदारी भी कर रहा है और आपस में प्रतिस्पर्धा में भी जुटा है. सोशल मीडिया ने पूरी दुनिया के लोगों को एक मंच पर लाकर खड़ा कर दिया है. एक भारतीय वैसे ही किसी अमेरिकी या जापानी से बहस कर सकता है जैसे वो कुछ समय पहले तक अपने गांव की चौखट या पंचायत और पान की दुकान पर करता था. इस सुविधा ने इस नये जन को नयी ताकत दी है और उसके लिये ज्ञान के नये द्वार खोले हैं. अब वो बड़े-बड़े नामों से भयभीत नहीं होता. न ही अपने को कमतर महसूस करता है.
अकेली नहीं है गुरमेहर
आज जरूरत इस नयी आकांक्षा को समझने की है. नये सामाजिक व्यक्तित्व के बरक्स नये राजनीतिक यंत्र को इजाद करने की है. गुरमेहर अकेली दिख सकती है, पर वो अकेली है नहीं. उसके लिखे शब्द पूरे विश्व से जुड़े हैं. फ्रांस में जब रानी ने लोगों को केक खाने का ज्ञान दिया था तब लोगों की भावनायें आहत हुईं थी. तब क्रांति का आह्वान हुआ था.
गुरमेहर जैसे लोगों को समझने की आवश्यकता है. उस जैसे लोग जब नई बहस को जन्म देते हैं जिनकी कोई पहचान नहीं थी तो मतलब साफ है राजनीति असफल हो रही है, विचारधारा के वर्चस्व के संघर्ष में असली मुद्दे पीछे छूट रहे हैं. उनको समय रहते अगर हैंडल नहीं किया गया तो कौन जाने भविष्य के किस कोने में कौन सा तहरीर स्क्वायर बैठा है और न जाने कहां से कोई गुरमेहर वेल घोनिम बन जाये.

(लेखक आम आदमी पार्टी के प्रवक्‍ता हैं. इस आलेख में प्रकाशित विचार उनके अपने हैं)

अब मेरठ में निकला चूरनछाप नोट

अब तक तो भारत में हमारे नोटों के ऊपर भारतीय रिज़र्व बैंक लिखा होता था, लेकिन जब से मोदी सरकार ने नोटबंदी का फैसला लिया है तब से कभी आधी छपाई वाले नोट नोट लोगों को मिले हैं तो कभी बिना महात्मा गाँधी जी की तस्वीर वाले नोट भी ATM मशीन से निकले हैं और इस तरह की गलतियों पर सरकार और भारतीय रिज़र्व बैंक को बार बार सफाई देनी पड़ी है, लेकिन पिछले 15 दिनों में ये तीसरी बार है कि ATM से चूरन छाप नोट निकला हो मेरठ में PNB के ATM से चूरन छाप लिखा हुआ नोट निकला है इससे पहले 06 फरवरी 2016 को दिल्ली के संगम विहार में भारतीय स्टेट बैंक के ATM से 2000 के नोट निकले जिन पर भारतीय रिज़र्व बैंक की बजाय भारतीय मनोरंजन बैंक लिखा हुआ है और इतना ही नहीं उसके ऊपर अशोक चिन्ह के स्थान पर चूरन लेबल भी लिखा हुआ है और उसके बाद शाहजहाँपुर में भी ATM से ऐसा ही नोट निकला था अब पता नहीं इसपर सरकार और भारतीय रिज़र्व बैंक क्या कहेगी, परंतु इन गलतियों से एक बात तो साबित हो गयी है की नोटबंदी का फैसला मोदी सरकार की बहुत बड़ी भूल और गलती थी क्योंकि जब लोग अपने ही पैसे लेने के लिए घंटों बैंक एवम ATM की पंक्तियों में खड़े हों और उन्हें गलत छपाई वाले नोट मिले जो बाज़ार और दुकानों पर ना चल पाते हों इससे तो यही लगता है कि यह फैसला बिना किसी तैयारी के हड़बड़ी में लिया गया फैसला है और इसके दूरगामी परिणाम बहुत अच्छे नहीं होने वाले हैं l

नोटबंदी का ऐलान अचानक 08 नवम्बर 2016 को देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था और कहा था कि इससे भ्रस्टाचार आतंकवाद और काल धन आदि लेकिन ऐसा कुछ होता नहीं दिखाई पड़ता इसके विपरित 08 नवम्बर के बाद से आम लोगों को बहुत मुशिबतों का सामना करना पड़ा है और ये सिलसिला अब तक जारी है l
नोटबंदी की वजह से लगभग 200 लोगों की जान उस वक़्त चली गयी जब वो अपना पैसा निकालने के लिए बैंक की पंक्ति में खड़े थे और कानपुर के एक गांव में बैंक की पंक्ति में खड़ी एक महिला ने एक बच्चे को जनम दिया और उसका नाम खजांची रख दिया और ये फैसला ऐसे समय लिया गया जब गेंहूँ की बुवाई का समय था तो ये फैसला किसानों के लिए तो एक भयानक सपने के आलावा और कुछ नहीं था अलग अलग समाचार पत्रो की खबरों के मुताबिक लाखों लोग बेरोज़गार हो गये सैकड़ों कारखाने बंद हो गए और तो और सेना द्वारा मारे गए आतंकियों के पास से 2000 के नोट भी बरामद हुए हैं l

इन सब मामलों को ध्यान से देखें तो समझ में आयेगा कि यह फैसला मोदी सरकार ने बिना किसी गहन अध्ययन के अपने मनोरंजन के लिए ले लिया था क्योंकि यदि ऐसा नहीं होता तो इस फैसले के 100 दिन गुजर जाने के बाद भी लोगों को इतनी तकलीफों का सामना नहीं करना पड़ता l

ATMसे निकले नोटों पर निम्न गलतियां हैं :
1. भारतीय रिज़र्व बैंक के स्थान पर भारतीय मनोरंजन बैंक
2 . सीरिअल नंबर 000000
3 . रुपये वाला निशान नहीं है
4 . रिज़र्व बैंक की मौहर की जगह पी के का निशान
5 . मैं धारक को 2000 रुपये का वचन देता हूँ की जगह मैं धारक को 2000 कूपन देने का वचन देता हूँ
6 . गवर्नर के हस्ताक्षर भी नहीं हैं
7. रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया की जगह चिल्ड्रन बैंक ऑफ़ इंडिया
8. अशोक चिन्ह की जगह चूरन का लेबल है

गुरमेहर विवाद पर गंभीर ने दिया सहवाग को जवाब

सोशल मीडिया पर २० साल की छात्रा गुरमेहर कौर को ट्रोल करने के मामले मैं पूर्व भारतीय सलामी बल्लेबाज़ वीरेन्द्र सहवाग को कड़ी आलोचना झेलनी पड़ रही है जिस तरह से उन्होंने गुरमेहर की भावनाओं का मज़ाक उड़ाया ये किसीको भी पसंद नहीं आया l सोशल मीडिया जहाँ एक तरफ खुद गुरमेहर सहवाग द्धारा ट्रोल किये जाने से दुखी हैं और गुरमेहर लिखती हैं की मेरे खिलाफ ट्रॉल्स को भड़काने के लिए सहवाग का शुक्रिया जिन्हें कभी मैंने अपना हीरो माना था आज वही मेरे खिलाफ लोगों को भड़का रहे हैं l इसके अलावा सहवाग की आलोचना टेलीविज़न मीडिया भी कर रहा है और जावेद अख्तर जैसी बड़ी हस्तियां भी सहवाग की आलोचना कर रही हैं l

पर आज इसमें नया मोड़ तब आया जब वीरेंद्र सहवाग के साथी रहे सलामी बल्लेबाज़ गौतम गंभीर ने एक विडियो जारी कर वीरेंद्र सहवाग और दूसरे लोगों पर निशाना साधा जो गुरमेहर कौर को देशद्रोही बता रहे थे, अपने इस विडियो मैं गौतम गंभीर ने दिखाया है की वो भारतीय फौज का सम्मान सबसे ज्यादा करते हैं और वो गुरमेहर कौर से सहमत नहीं हैं की युद्ध ने गुरमेहर के पिता को मारा है पाकिस्तान ने नहीं लेकिन आगे इस विडियो में दिखाया गया है की हो सकता है मै गुरमेहर से सहमत नहीं हूं पर लोकतंत्र में सबको अपनी बात कहने का अधिकार होता है चाहे हम उससे सहमत हों या ना हों क्योंकि भारत एक लोकतंत्र है तो यहाँ सभी को अपनी बात कहने का अधिकार है, किसी को भी एक बयान के आधार पर देशद्रोही नहीं ठहराया नहीं जा सकता है और यही विडियो अब सहवाग के लिए शर्मिंदगी का सबब बन गया है जहाँ एक तरफ सहवाग गुरमेहर को देशद्रोही बताने वालों को और उकसाने का काम कर चुके थे वहीं गौतम गंभीर का विडियो उन सब तथाकथित राष्ट्रवादियों की पोल खोलता दिखाई पड़ता है जो अभिव्यक्ति की आज़ादी को मार देना चाहते हैं l

शायद बहुत कम लोगों को यह बात पता हो की गंभीर शहीद-ए-आज़म भगत सिंह को अपना आदर्श मानते हैं इसीलिए उन्होंने इस विडियो के जरिये उन्होंने उन लोगों पर निशाना निशाना साधा है जो सरकार से सवाल पूछने वालों को देशद्रोही बताते हैं, जैसे की ऊपर बताया गया है की गंभीर के आदर्श शहीद-ए-आज़म भगत सिंह हैं जिनका मानना था की किसी के भी विचारों को दबाया नहीं जा सकता यह लोकतंत्र के लिए हानिकारक है और अभिव्यक्ति की आज़ादी के खिलाफ है l गंभीर के इस विडियो के बाद अब सहवाग की तरफ से सफाई भी आ गयी है की उन्होंने ये सिर्फ एक मज़ाक के तौर पे किया था और गुरमेहर को ठेस पहुँचाना उनका मकसद नहीं था और वो अभिव्यक्ति की आज़ादी के खिलाफ नहीं हैं l