वीडियो:अलका लाम्बा ने मस्जिद के नाम पर भड़काने वाले की बोलती बंद कर दी


आम आदमी पार्टी की विधायिका अलका लाम्बा अपने विधानसभा क्षेत्र चाँदनी चौक में एक जगह बिजली का ट्रांसफार्मर लगवाने के लिए पहुँची हुईं थीं, लेकिन जिस जगह पर ट्रांसफार्मर लगाना था उस पर कई वर्षोँ से कुछ लोगों ने अवैध कब्जा कर रखा था और वो इसका किराया भी सरकार को नहीं दे रहे थे। जैसे ही अलका लाम्बा ने कहा कि जगह खाली करो यहाँ ट्रांसफार्मर लगना है तो वहाँ लोगों ने उनका विरोध शुरू कर दिया और कहने लगे कि हम अगली बार आपको वोट नहीं देंगे।
जब अलका ने ये बात सुनी तो उन्होंने कहा कि आप मुझे हरा देना लेकिन मैं लोगों को गर्मी से नहीं मरने देंगी। इसके बाद लोग अलका से और ज्यादा बहस करने लगे तो अलका ने कहा कि एक तो आप लोगों ने 20 वर्षों से इस सरकारी जगह पर अवैध कब्जा किया हुआ है नोटिस देने के बावजूद इसे खाली नहीं करते और ना ही कोई किराया देते हैं यदि देते तो कई विधवाओं को पेंशन मिलने लग जाती। इसके बाद अलका ने कहा मैं आपको 10 मिनट का समय देती हूँ लेकिन लोग नहीं माने तो फिर अलका खुद ही आगे बढ़ने लगीं।
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जब अलका आगे बढ़ने लगीं तो जिस व्यक्ति ने कब्जा किया हुआ था वो मस्जिद की बात करने लगा , मस्जिद की बात सुनते ही अलका को गुस्सा आ गया और उन्होंने कहा कि आपको शर्म आनी चाहिए। आप जैसे लोग हर बात में मंदिर मस्जिद निकालते हैं जब बिजली नहीं आएगी तो आप ही अलका मुर्दाबाद केजरीवाल मुर्दाबाद चिलायेंगे और इसके बाद अलका लांबा ने भारत माता की जय और इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाये तो वहाँ मौजूद भीड़ ने तालियों के साथ अलका का साथ दिया । फिर अलका ने उस जगह का ताला खुलवा कर वहाँ ट्रांसफार्मर लगवा दिया।

नीतीश को झटका शरद यादव बनाएंगे नई पार्टी


बिहार में महागठबंधन की सरकार से अलग होकर बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाने के जेडीयू के फैसले से नाराज चल रहे पार्टी के वरिष्ठ नेता शरद यादव नई पार्टी बना सकते है। मीडिया में चल रही खबरों के मुताबिक नीतीश के बीजेपी के साथ जाने के फैसले पर दुख जाहिर कर चुके पूर्व जेडीयू अध्यक्ष शरद यादव का नया राजनीतिक मोर्चा कांग्रेस नीत यूपीए गठबंधन का हिस्सा होगा। मीडिया में चल रही इन खबरों पर शरद यादव के करीबी माने जाने वाले जेडीयू नेता विजय वर्मा ने बताया कि शरद जी ने इस संदर्भ में बिहार राज्य यूनिट के कई पदाधिकारियों से भी बात की है।

अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी नीतीश कुमार ने जेडीयू के वरिष्ठ नेता की नाराजगी और देश के कई राज्यों की जेडीयू यूनिट के नेताओं के इस्तीफे पर साफ कर दिया था कि जेडीयू बिहार की पार्टी है. बिहार में जो है वो ठीक है. बाकि कहीं क्या हो रहा है इसका जेडीयू से कुछ लेना-देना नहीं है। आपको बता दें कि शरद यादव ने नीतीश के फैसले को गलत बताते हुए इसे जनता से करार तोड़ना बताया था।

विजय वर्मा ने इसी सप्ताह में शरद की नई पार्टी या राजनीतिक मोर्चे की घोषणा होने की तरफ इशारा किया. आपको बता दें कि शरद यादव की नाराजगी को लेकर नीतीश कुमार गुट के संजय सिंह ने कहा था कि “शरद जी हमारे वरिष्ठ नेता हैं, लेकिन अगर वे अलग राह पर जाना चाहते हैं तो वे ऐसा करने के लिए स्वतंत्र है।’

शरद यादव में बिहार में बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाने के नीतीश कुमार के फैसले को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा है कि वो इससे समहत नहीं थे. उन्होंने कहा कि बिहार में जनादेश इसके लिए नहीं था. महागठबंधन के टूटने के बाद से ही यह कयास लगाया जा रहा था कि शरद यादव नीतीश के फैसले से खुश नहीं हैं। लेकिन उन्होंने अब तक कुछ भी खुलकर नहीं बोला था। इस बीच उनके घर पर विपक्ष के कई नेताओं का आना-जाना लगा रहा।

नीतीश कुमार को देना पड़ सकता है इस्तीफा

उच्चतम न्यायालय ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की विधान परिषद की सदस्यता रद्द करने की मांग को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई के लिये मंगलवार को सहमत हो गया। याचिका में कुमार पर कथित तौर पर लंबित आपराधिक मामला छिपाने का आरोप लगाया गया है। न्यायमूर्ति दीपक मिश्र, न्यायमूर्ति अमिताव रॉय और न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर की पीठ ने याचिकाकर्ता अधिवक्ता एम एल शर्मा के मामले की तत्काल सुनवाई के अनुरोध पर कहा कि वह इसे देखेगी. पीठ ने कहा कि वह देखेगी कि मामले को सुनवाई के लिए कब सूचीबद्ध किया जा सकता है।

हत्या के मामले में नितीश को देना पड़ सकता है इस्तीफा


बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार महागठबंधन से इसीलिए इस्तीफा दिया था कि तेजस्वी यादव पर जो भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे वो उनपर सफाई नहीं दे पाए दब लेकिन अब
सोमवार(31 जुलाई) को दायर की गई याचिका में आरोप लगाया है कि नीतीश कुमार के खिलाफ एक आपराधिक मामला है। इसमें वह वर्ष 1991 के बाद लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव से पहले स्थानीय कांग्रेस नेता सीताराम सिंह की हत्या और चार अन्य लोगों को घायल करने के मामले में आरोपी हैं। याचिकाकर्ता ने शीर्ष अदालत से सीबीआई को इस मामले में कुमार के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश देने का भी अनुरोध किया है। उन्होंने कहा कि प्रतिवादी संख्या दो (चुनाव आयोग) ने कुमार के खिलाफ आपराधिक मामले की जानकारी होने के बावजूद उनकी सदन की सदस्यता रद्द नहीं की और प्रतिवादी आज तक संवैधानिक पद पर बने हुए हैं।

अधिवक्ता ने चुनाव आयोग के वर्ष 2002 के आदेश के अनुसार कुमार की सदस्यता रद्द करने की मांग की है, जिसके अनुसार उम्मीदवारों को नामांकन पत्र के साथ हलफनामे में अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों का ब्योरा भी देना पड़ता है। उन्होंने दावा किया कि बिहार के मुख्यमंत्री ने वर्ष 2012 को छोड़कर वर्ष 2004 के बाद कभी भी अपने खिलाफ लंबित मामले की जानकारी नहीं दी।

सुप्रीम कोर्ट बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की विधान परिषद की सदस्यता रद्द करने की मांग को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई के लिए सहमत हो गया है। याचिका में नीतीश कुमार पर कथित तौर पर लंबित आपराधिक मामला छिपाने का आरोप लगाया गया है। न्यायमूर्ति दीपक मिश्र, न्यायमूर्ति अमिताव रॉय और न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर की पीठ ने याचिकाकर्ता अधिवक्ता एमएल शर्मा के मामले की तत्काल सुनवाई के अनुरोध पर कहा कि वह इसे देखेगी। पीठ ने कहा कि वह देखेगी कि मामले को सुनवाई के लिए कब सूचीबद्ध किया जा सकता है।
इस सब पर बीजेपी की तरफ से कोई प्रतिक्रिया आई है, इस केस पर सारे देश की नज़रें टिकी हैं और इसका फैसला नीतिश और मोदी के नए गठबंधन के बाद और भी महत्वपूर्ण हो गया है।

भाजपा सांसदों ने ही कराई मोदी की किरकिरी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई बार बीजेपी सांसदों को संसद की कार्यवाही के दौरान सदन में अपनी अटेंडेंस बढ़ाने की नसीहत दे चुके हैं, लेकिन लगता नहीं कि बीजेपी सासंदों पर इसका कोई असर हुआ है। बीजेपी सांसदों के इसी रवैये के चलते सोमवार को सदन में सरकार की किरकरी हो गई। दरअसल, राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने संबंधी संविधान संशोधन विधेयक संसद में पास तो हुआ लेकिन विपक्ष का एक संशोधन मंजूर हो गया। ऐसा एनडीए के सांसदों की गैरमौजूदगी के चलते हुआ। बताया जा रहा है इस घटनाक्रम से पीएम मोदी बेहद नाराज हैं। चूंकि यह संविधान संशोधन बिल है, ऐसे में संशोधित बिल को लोकसभा से दोबारा पास करवाना होगा। वहां से पास होने के बाद राज्यसभा में फिर बिल आएगा।

इससे पहले राज्य सभा में सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री थावर चंद गहलोत ने संविधान संशोधन बिल राज्यसभा में पेश किए। गहलोत ने इन विधेयकों के मकसद और कारणों का जिक्र करते हुए कहा है कि इन विधेयकों के जरिए देश में पिछड़े वर्गों के हितों की प्रभावी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की तर्ज पर पिछड़ा वर्ग आयोग को भी संवैधानिक दर्जा दिया जा सकेगा। उन्होंने कहा कि 1993 में गठित पिछड़ा वर्ग आयोग अभी सिर्फ सामाजिक और शैक्षणिक आधार पर पिछड़ी जातियों को पिछड़े वर्गों की सूची में शामिल करने या पहले से शामिल जातियों को सूची से बाहर करने का काम करता था। प्रस्तावित विधेयक के प्रावधानों के तहत नए आयोग में एक अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और तीन अन्य सदस्य शामिल होंगे।

मजबूर हो गए मोदी
बिल को पास कराने के दौरान तब असाधारण स्थिति पैदा हुई जब विपक्ष खासकर कांग्रेस सदस्यों का संशोधन पास हो गया। इसमें कांग्रेस का संशोधन था कि ओबीसी कमीशन में एक महिला और एक अल्पसंख्यक मेंबर भी हो। इस संशोधन का सरकार ने विरोध किया। लेकिन नियम के हिसाब से सरकार संशोधित बिल के साथ ही आगे बढ़ सकती थी। इसके बाद कांग्रेस और बीजेपी दोनों सदस्यों के बीच तीखी झड़प भी हुई। बीजेपी ने कांग्रेस को ओबीसी विरोधी बताया तो कांग्रेस ने कहा कि वह महिला को इसमें नहीं रखना चाहती है। बीच का हल निकालने के लिए बीच में सदन का काम 10 मिनट भी रोका गया। लगभग एक घंटे तक चली बहस के बाद सरकार संशोधित बिल को पास कराने पर मजबूरन मंजूर हो गई। अब यह बिल लोकसभा में जाएगा। लेकिन अब यह देखना होगा कि क्या सरकार लोकसभा में वह विपक्ष के संशोधन के साथ ही पास करवाती है या पुराने बिल को ही पास कर दोबारा राज्यसभा में लौटाती है।