दिल्लीः449 निजी स्कूलों ने फीस लौटानी शुरू की

केजरीवाल सरकार ने 17 अगस्त को 449 निजी स्कूलों को बढ़ी हुई फीस वापिस करने का जो नोटिस दिया था उसे दिल्ली के उपराज्यपाल अनिल बैजल की मंजूरी मिल गयी है। इसके बाद अब तक 17 निजी स्कूलों ने दिल्ली उच्च न्यायालय में बढ़ी हुई फीस जमा करा दी है और अब जब इसे उपराज्यपाल की मंजूरी मिल गई है तो अब बाकी बचे स्कूलों को भी फीस वापिस करनी ही पड़ेगी। केजरीवाल सरकार का यह कदम सभी राज्य सरकारों के लिए एक नजीर है कि यदि सरकार चाहे तो क्या नहीं कर सकती? जो देश की आज़ादी के 70 साल बाद भी निजी स्कूल अपनी मनमानी कर रहे हैं और सरकारें उनके आगे लाचार हैं,लेकिन केजरीवाल सरकार ने इस प्रथा को बदला है उम्मीद है कि दूसरे राज्य भी इसका अनुसरण करेंगे।

इससे पहले 17 अगस्त 2017 को दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर निजी स्कूलों को कहा था कि या तो वो बच्चों से ली गयी बढ़ी हुई फीस 9% ब्याज के साथ अभिभावकों को वापिस करें नहीं तो दिल्ली सरकार सभी 449 स्कूलों को अपने अधीन ले लेगी और इन स्कूलों को दिल्ली सरकार ही चलायेगी। इसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा कि उनकी या उनकी सरकार की मंशा निजी स्कूलों को अपने अधीन करने की नहीं है वो तो सिर्फ इतना चाहते हैं अनिल दवे कमीटी की रिपोर्ट के अनुसार निजी स्कूल बढ़ी हुई फीस छात्रों के अभिभावकों को 9% ब्याज के साथ वापिस करें।

ज्ञात हो कि दिल्ली की अरविंद केजरीवाल की सरकार ने पिछले साल दिल्ली सरकार की जमीन पर बने सभी निजी स्कूलों का ऑडिट करवाया था जिससे कि सरकार यह पता लगा पाये की निजी स्कूल जो फीस छात्रों से ले रहे हैं वो कितनी जायज़ है। लेकिन ऑडिट में जो तथ्य सामने आये तो दिल्ली सरकार ने यह आदेश जारी किया कि कोई भी निजी स्कूल बिना सरकार की अनुमति के फीस नहीं बढ़ायेगा।लेकिन इसके बावजूद बहुत से स्कूलों ने मनमानी फीस बढ़ा दी और छात्रों से फीस ले भी ली। यही नहीं निजी स्कूलों का संगठन दिल्ली सरकार के फैसले के खिलाफ दिल्ली उच्च न्यायालय भी गया लेकिन उसे वहाँ से भी कोई राहत नहीं मिली। इसके बाद ही केजरीवाल सरकार ने निजी स्कूलों को कहा या तो बढ़ी हुई फीस वापिस करो या दिल्ली सरकार इन सभी स्कूलों को अपने अधीन ले लेगी। दिल्ली की केजरीवाल सरकार का यह फैसला पूरे देश में शिक्षा के नाम पर चल रहे व्यापार को समाप्त करने की ओर एक साहसिक कदम है। इस फैसले के बाद अन्य राज्यों की सरकारों पर भी दबाव बढ़ेगा कि वो भी अपने-अपने राज्यों में निजी स्कूलों की मनमानी पर ऐसी ही लगाम लगायें।

इस सरकारी विद्यालय में 900 बच्चे प्राइवेट विद्यालय से आये हैं!


जब भी भारत में कोई  भी कोई चुनाव होता है लोकसभा का या फिर विधानसभा का सभी राजनीतिक दल ये वादा जरूर करते हैं कि हम भारत के बच्चों का भविष्य संवारने के लिए सरकारी विद्यालयों में शिक्षा का स्तर प्राइवेट विद्यालयों से भी अच्छा कर देंगे । यह आज़ादी के बाद से ही सभी दल बोलते आये हैं और सभी नेता चाहे वो देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू हों या फिर इस समय के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी।

लेकिन आजादी के इतने साल बाद भी सरकारी विद्यालयों की हालत जस की तस बनी हुई है। सरकारी विद्यालयों में अच्छी पढ़ाई तो दूर की बात है सरकारी विद्यालयों में छात्र-छात्राओं के बैठने के लिए कमरे तक नहीं होती। यदि बारिश हो जाये तो छुट्टियां हो जाती हैं, पर्याप्त शिक्षक नहीं होते है जो बच्चों को पढ़ा सकें। पीने का पानी यहाँ तक कि सरकारी विद्यालयों में शौचालय तक नहीं होते हैं। ऐसी ही तमाम समस्या हैं इसी की वजह से सभी माँ-बाप अपने बच्चों को महंगे प्राइवेट विद्यालयों में भेजने के लिए मजबूर हैं।

लेकिन देश में पहली बार एक ऐसी सरकार बनी है जिसने जो वादा किया था उसे पूरा कर रही है और वो है दिल्ली की आम आदमी पार्टी की दिल्ली की सरकार जिसने सिर्फ भाषण नहीं दिये बल्कि ज़मीन पर काम कर रही है। अब दिल्ली के सरकारी विद्यालयों में कंप्यूटर लैब हैं, एयर कंडीशन लग रहे हैं, सीसीटीव कैमरे हैं और तो और स्विमिंग पूल तक भी हैं। 

इन सब सुविधाओं से लैस रोहिणी सेक्टर21 के सरकारी विद्यालय में 900 बच्चे प्राइवेट विद्यालय से आये हैं। यह किसी चमत्कार से कम नहीं है। लेकिन ये सब इतना आसान नहीं था इसके लिए दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार ने बहुत सारे कदम उठाए हैं जैसे कि शिक्षा का बजट लगातार 2 साल से 25% है जो कि भारत में किसी भी राज्य में शिक्षा का बजट सबसे ज्यादा है। इसी के कारण दिल्ली सरकार अपने शिक्षकों एवं प्रधानचार्य को आईआईएम और विदेश में कैम्ब्रिज व होवार्ड जैसे संस्थानों में ट्रेनिंग के लिए भेज पाई और इस सबका ही नतीजा है कि पिछले 2 वर्षों से दिल्ली सरकार के विद्यालयों का कक्षा 12 का परिणाम प्राइवेट विद्यालयों से बेहतर आ रहा है। ऐसा ही यदि सारे राज्यों के सरकारी विद्यालय बन जायें तो यकीनन भारत मे जो शिक्षा के नाम पर धंधा चल रहा है वो बंद हो जाएगा।

अंग्रेजी भाषा का ज्ञान जरुरी

आज के इस तकनीकी युग में तकनीकी ज्ञान के साथ-साथ आपका अपने विचारों को प्रकट करने का तरीका भी बहुत प्रभावशाली होना चाहिए अर्थात आपकी कम्युनिकेशन स्किल बहुत ही बेहतरीन होनी चाहिए विशेषकर अंग्रेजी भाषा पर आपकी पकड़ मजबूत होना बहुत ही जरुरी है क्योंकि अंग्रेजी एक वैश्विक भाषा है चाहे वो संयुक्त राज्य संघ हो या भारत में ही नौकरी प्राप्त करने हेतु आपकी अंग्रेजी बहुत ही बेहतरीन होनी चाहिए, आपके पास बेशक असाधारण विचार होंगे, परंतु यदि अंग्रेजी पर आपकी पकड़ नहीं है तो आपको आपकी मैनेजमेंट भी दरकिनार कर सकती है। वहीं अंग्रेजी में पकड़ कमजोर होने के कारण आपकी कार्यक्षमता पर भी असर पड़ सकता है। सबसे बुरा तो तब होता है, जब एक अंग्रेजी बोलने वाले साधारण सा कर्मचारी आपके विचारों को अपने नाम से ले उड़ते हैं! तो अंग्रेजी का महत्व आप समझ ही गए होंगे?
कम्युनिकेशन स्किल्स हर जगह जरूरी होती हैं, चाहे आप सहकर्मियों से बात करें, ग्राहकों से या अपने सुपरवाइजर के साथ, आपको अपने विचारों, लक्ष्यों आदि को ठीक से व्यक्त करना आना चाहिए। इसलिए यदि आप अंग्रेजी पर पकड़ मजबूत करते हैं और विश्वास के साथ अंग्रेजी में बात करते हैं तो आपकी छवि एक ‘लीडर’ की बनेगी, न कि ‘अनुयायी’ की।
आजकल गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और याहू जैसी बड़ी-बड़ी कंपनियाँ भारतीय छात्रों को नौकरी के अवसर प्रदान करती हैं और भारत में मिलने वाली मासिक आय से कई गुना अधिक आय देती हैं, लेकिन ये तभी संभव है जब तकनीकी ज्ञान के साथ-साथ छात्रों का अंग्रेजी भाषा पर पकड़ बहुत ही मज़बूत हो क्योंकि ये सारी कंपनियाँ वैश्विक स्तर पर काम करती हैं तो इनके साथ काम करने के लिए वैश्विक भाषा का आना बहुत ही जरुरी है जो कि अंग्रेजी है इतना ही नहीं यदि आप भारत में भी IAS या IPS बनने का सपना देख रहे हैं तो उसके लिए भी आपकी अंग्रेजी बहुत ही अच्छी होनी चाहिये अन्यथा आपका सपना सपना ही रह जायेगा।
इसके अलावा निजी कम्पनियों में भी नौकरी हेतु अंग्रेजी भाषा पर पकड़ का होना बहुत ही आवश्यक है अन्यथा आपके पास कितनी भी बड़ी कोई भी डिग्री क्यों न हो पर आपको एक अच्छी बड़ी कंपनी में नौकरी नहीं मिलेगी क्योंकि आजकल सभी कंपनियां वैश्विक स्तर पर अपनी सेवाएं प्रदान कर रही हैं या अपना सामान बेच रही हैं तो अंग्रेजी का ज्ञान होना बहुत ही जरुरी है तो अब तो आपकी समझ में आ गया होगा कि बिन अंग्रेजी सब सून इसलिए जरुरी है की पढ़ते समय से ही हम अंग्रेजी बोलने एवं सिखने का प्रयास करें और जीवन में सफलता प्राप्त करें।

लाला लाजपत राय को याद रखना

लाला लाजपत राय का जन्म 28 जनवरी 1865 पंजाब के फरीदकोट जिले में हुआ था, इन्होंने कुछ समय हरियाणा के रोहतक और हिसार शहरों में वकालत की। 1880 में उन्होंने कलकत्ता तथा पंजाब विश्वविद्यालय से एंट्रेंस की परीक्षा एक वर्ष में पास की और आगे पढ़ने के लिए लाहौर आए। यहां वे गर्वमेंट कॉलेज में प्रविष्ट हुए और 1982 में एफए की परीक्षा तथा मुख्यारी की परीक्षा साथ- साथ पास की। यहीं वे आर्यसमाज के सम्पर्क में आए और उसके सदस्य बन गये। लाला लाजपत राय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गरम दल के प्रमुख नेता थे। बाल गंगाधर तिलक और बिपिन चंद्र पाल के साथ इस त्रिमूर्ति को लाल-बाल-पाल के नाम से आज भी जाना जाता है इन्हीं तीनों नेताओं ने सबसे पहले भारत में पूर्ण स्वतन्त्रता की माँग की थी बाद में समूचा देश इनके साथ हो गया। वे भारत के एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी थे, लाल जी को पंजाब केसरी भी कहा जाता है। उन्हें ‘पंजाब के शेर’ की उपाधि भी मिली थी।

लाला लाजपत राय ने अपने जीवन की परवाह न करते हुए हमेशा हमेशा देश की स्वाधीनता के आंदोलन में बढ़-चढ़कर ना सिर्फ हिस्सा लिया बल्कि उन्होंने भारत को आज़ादी दिलाने में बहुत ही महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। 3 फ़रवरी, 1928 को साइमन कमीशन भारत पहुँचा, जिसके विरोध में पूरे देश में आग भड़क उठी। लाहौर में 30 अक्टूबर, 1928 को एक बड़ी घटना घटी, जब लाला लाजपत राय के नेतृत्व में साइमन कमीशन का विरोध कर रहे युवाओं को बेरहमी से पीटा गया। पुलिस ने लाला लाजपत राय की छाती पर निर्ममता से लाठियाँ बरसाईं। वे बुरी तरह घायल हो गए। इस समय अपने अंतिम भाषण में उन्होंने कहा था “मेरे शरीर पर पड़ी एक-एक लाठी ब्रिटिश सरकार के ताबूत में एक-एक कील का काम करेगी।” इस घटना के 17 दिन बाद यानि 17 नवम्बर, 1928 को लाला जी ने आख़िरी सांस ली और सदा के लिए अपनी आँखें मूँद लीं।

लेकिन उनका बलिदान बेकार नहीं गया, लाला जी की मृत्यु से सारा देश उत्तेजित हो उठा और चंद्रशेखर आज़ाद, भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव व अन्य क्रांतिकारियों ने लालाजी की मौत का बदला लेने का निर्णय किया। इन जाँबाज देशभक्तों ने लालाजी की मौत के ठीक एक महीने बाद अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर ली और 17 दिसम्बर 1928 को ब्रिटिश पुलिस के अफ़सर सांडर्स को गोली से मार दिया,सांडर्स ही वो अंग्रेज था जिसने लाला जी पर लाठियाँ बरसाईं थीं। लालाजी के बलिदान के 20 साल के भीतर ही ब्रिटिश साम्राज्य का सूर्य अस्त हो गया और 15 अगस्त 1947 को भारत को अंग्रेजो के राज से आज़ादी मिली। ये आज़ादी हमें लाला राय की तरह अनेक स्वतंत्रता सेनानियों के बदौलत मिली है इसीलिए उन्हें सदा रखना और उनसे सिख लेते रहना चाहिये।

जीवन को बदलने वाली किताबें

आज के इस लेख में भारतीय लेखकों द्वारा लिखी गईं कुछ प्रेरणादायक पुस्तकों के बारे में जानेंगे जो कि निम्नलिखित हैं

“द रिचेस्ट इंजीनियर” जिसे अभिषेक कुमार ने लिखा है, लेखक अभिषेक कुमार की यह किताब बहुत ही प्रेरणादायक है। यह पुस्तक एक ओर यह बताती है कि एक व्यक्ति किस तरह से अपनी वित्तीय स्थिति को बदल सकता है तो दूसरी तरफ इस पुस्तक को पढ़ने के बाद बहुत ही अधिक प्रेरणा मिलती है की एक व्यक्ति किस प्रकार कठिन परिस्थितियों में से उभर कर एक सफल व्यक्ति बन सकता है।
दूसरी किताब है मराठी में लिखी गयी माती, पंख आणि आकाश यह किताब भी बहुत ही प्रेरणादयक है, इसे संयुक्त राज्य अमेरिका में भारत के पूर्व राजदूत ज्ञानेश्वर मुले ने लिखा है इस किताब में लेखक ने महाराष्ट्र के एक गांव में पैदा हुए बच्चे का एक राजदूत बनने तक के सफर को बताया है जो बहुत ही प्रेरणादायक है।इसी श्रृंखला तीसरी किताब है शिव खेड़ा की बेचना सीखो और सफल बनो, यदि कोई अपना व्यापार करना चाहता है तो यह किताब उन लोगो के लिए बहुत ही प्रेरणा देती है। यह किताब छल कपट नहीं सीखाती है बल्कि एक अच्छा प्रोफेशनल बनाती है, जो भी व्यक्ति प्रोडक्ट, सर्विस या विचार बेचता है वो सेल्समेन कहलाता है बेचना सीखो और सफल बनो” इन्ही सिद्धांतों पर आधारित यह किताब एक सफल प्रोफेशनल बनाने में सहायक है| शिव खेडा ने इसमें सिद्धात शब्द का प्रयोग किया है जोड़-तोड़ का नहीं| क्योंकि सिद्धांतों की बुनियाद ईमानदारी होती है जब की जोड़-तोड़ छल कपट पर टिकी होती है| हमें छल कपट नहीं सीखना है बल्कि एक अच्छा प्रोफेशनल बनना है|

चौथी किताब है शिव खेड़ा की ही “जीत आपकी” इसका अंग्रेजी नाम है “यू कैन विन” इस किताब से भी बहुत प्रेरणा मिलती है कि कैसे सबकुछ तबाह हो जाने के बाद भी आप अपनी ज़िन्दगी में आगे बढ़ सकते है और सफलता हासिल कर सकते हैं, इसी का एक उदहारण भी इस किताब में दिया गया है की कैसे “1914 में, थॉमस एडिसन ने 67 साल की आयु में आग लगने की वजह से अपनी फैक्ट्री खो दी थी| फैक्ट्री का इन्सुरंस भी काफी कम था एडिसन ने अपने जिंदगीभर के संघर्ष को देखा और कहा, “आपदा का बहोत महत्त्व है, आपदा में हमारी सारी गलतिया जल जाती है” खुद तबाह होने की बजाये, आपदा के तीन हफ्तों बाद ही उन्होंने फोनोग्राफ की खोज की|

समय आपकी मुट्ठी में के लेखक हैं विजय अग्रवाल यह पुस्तक पूर्ण रूप से आपको आपके समय का सही सदुपयोग करने की प्रेरणा देती हे और सिखाती भी है की समय का सदुपयोग कैसे किया जाता है| शिव खेड़ा की “आज़ादी से जियें” भी बहुत ही प्रेरणादायक किताब है, आप इन सब किताबों को पढ़कर और उनसे प्रेरणा लेकर अपने जीवन को एक नई दिशा दे सकते हैं|

भारत में शिक्षा का इतिहास

भारत में शिक्षा का बहुत पुराना इतिहास रहा है। वर्तमान में यहाँ शिक्षा मुख्यतः सार्वजनिक संस्थानों से प्रदान की जाती है जिसमें नियंत्रण एवं वित्तपोषण तीन स्तरों से आता है – केन्द्र, राज्य एवं स्थानीय निकाय। 14 वर्ष तक के बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार प्रदान किया गया है। 2009 में भारतीय संसद द्वारा निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम पारित किया गया ।

यदि भारत में शिक्षा के इतिहास की बात करें तो प्राचीन समय में विद्यालय नहीं हुआ करते थे तब अधितकर गुरुकुल होते थे और गुरुकुलों की स्थापना प्राय: वनों, उपवनों तथा ग्रामों या नगरों में की जाती थी। वनों में गुरुकुल बहुत कम होते थे। अधिकतर दार्शनिक आचार्य निर्जन वनों में निवास, अध्ययन तथा चिन्तन पसन्द करते थे। भारतीय शिक्षा में बदलाव का दौर अंग्रेजों के शाशनकाल के समय से प्रारम्भ हुआ जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1780 कोलकाता में मदरसा स्थापित किया और फिर 1791 में बनारस में संस्कृत कॉलेज की स्थापना करवाई। 1873 में एक आज्ञापत्र के द्वारा शिक्षा में धन व्यय करने का निश्चय किया गया। वुड का घोषणापत्र (वुड्स डिस्पैच) सर चार्ल्स वुड द्वारा बनाया सौ अनुच्छेदों का लम्बा पत्र था जो 1854 में आया था। इसमें भारतीय शिक्षा पर विचार किया गया और उसके सम्बन्ध में सिफारिशें की गई थीं। चार्ल्स वुड उस समय ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के “बोर्ड ऑफ कन्ट्रोल” के सभापति थे।

1857 के स्वतंत्रता आंदोलन के समय ही कोलकाता, मुम्बई और चेन्नई में विश्वविद्यालय स्थापित हुए और 1870 में बाल गंगाधर तिलक और उनके सहयोगियों द्वारा पूना में फर्ग्यूसन कालेज की स्थापना, 1872 में एक कमीशन गठित किया जिसे “भारतीय शिक्षा आयोग” कहा गया एवं 1886 में आर्यसमाज द्वारा लाहौर (पाकिस्तान) में दयानन्द ऐंग्लो वैदिक कालेज की स्थापना और भारतीय शिक्षा में बड़ा परिवर्तन 1904 में आया जब भारतीय विश्वविद्यालय कानून बना, 1911 में गोपाल कृष्ण गोखले ने प्राथमिक शिक्षा को नि:::शुल्क और अनिवार्य करने का प्रयास किया लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। भारत को आज़ादी 1947 में मिली और 1951 में खड़गपुर में प्रथम आईआईटी की स्थापना हुई इससे भारतीय छात्रों को देश में ही तकनीकी शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिला ।

भारत के शिक्षा इतिहास में 1961 का साल बहुत महत्त्वपुर्ण साल कहा जा सकता है जब NCERT और प्रथम दो भारतीय प्रबन्धन संस्थान (IIM) अहमदाबाद एवं कोलकाता में स्थापना हुई और इसी तरह शिक्षा के क्षेत्र में सुधार के लिए तत्कालीन सरकारों ने महत्वपुर्ण कदम उठाये और इस सबमें सबसे प्रशंसनीय कदम 2009 में प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह के नेतृत्व में संसद ने निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम पारित किया था और आज हम कह सकते हैं की आज भारत ने शिक्षा के क्षेत्र में बहुत ऊँचा मकाम हासिल कर लिया है और यहाँ पर विदेशों से भी छात्र शिक्षा ग्रहण करने आते हैं और भारतीय छात्रों को तकनीकी के क्षेत्र में विदेशी कंपनियाँ अपने यहाँ काम करने के लिए एक अच्छा मेहनताना देती हैं ।