हत्या के मामले में नितीश को देना पड़ सकता है इस्तीफा


बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार महागठबंधन से इसीलिए इस्तीफा दिया था कि तेजस्वी यादव पर जो भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे वो उनपर सफाई नहीं दे पाए दब लेकिन अब
सोमवार(31 जुलाई) को दायर की गई याचिका में आरोप लगाया है कि नीतीश कुमार के खिलाफ एक आपराधिक मामला है। इसमें वह वर्ष 1991 के बाद लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव से पहले स्थानीय कांग्रेस नेता सीताराम सिंह की हत्या और चार अन्य लोगों को घायल करने के मामले में आरोपी हैं। याचिकाकर्ता ने शीर्ष अदालत से सीबीआई को इस मामले में कुमार के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश देने का भी अनुरोध किया है। उन्होंने कहा कि प्रतिवादी संख्या दो (चुनाव आयोग) ने कुमार के खिलाफ आपराधिक मामले की जानकारी होने के बावजूद उनकी सदन की सदस्यता रद्द नहीं की और प्रतिवादी आज तक संवैधानिक पद पर बने हुए हैं।

अधिवक्ता ने चुनाव आयोग के वर्ष 2002 के आदेश के अनुसार कुमार की सदस्यता रद्द करने की मांग की है, जिसके अनुसार उम्मीदवारों को नामांकन पत्र के साथ हलफनामे में अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों का ब्योरा भी देना पड़ता है। उन्होंने दावा किया कि बिहार के मुख्यमंत्री ने वर्ष 2012 को छोड़कर वर्ष 2004 के बाद कभी भी अपने खिलाफ लंबित मामले की जानकारी नहीं दी।

सुप्रीम कोर्ट बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की विधान परिषद की सदस्यता रद्द करने की मांग को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई के लिए सहमत हो गया है। याचिका में नीतीश कुमार पर कथित तौर पर लंबित आपराधिक मामला छिपाने का आरोप लगाया गया है। न्यायमूर्ति दीपक मिश्र, न्यायमूर्ति अमिताव रॉय और न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर की पीठ ने याचिकाकर्ता अधिवक्ता एमएल शर्मा के मामले की तत्काल सुनवाई के अनुरोध पर कहा कि वह इसे देखेगी। पीठ ने कहा कि वह देखेगी कि मामले को सुनवाई के लिए कब सूचीबद्ध किया जा सकता है।
इस सब पर बीजेपी की तरफ से कोई प्रतिक्रिया आई है, इस केस पर सारे देश की नज़रें टिकी हैं और इसका फैसला नीतिश और मोदी के नए गठबंधन के बाद और भी महत्वपूर्ण हो गया है।

सावन में शिव पूजा का महत्व

सावन का महीना शिवजी को बहुत प्रिय है ये तो हम सभी जानते हैं लेकिन क्या हम सब ये जानते हैं कि भगवान शिव को सावन का महीना क्यों प्रिय है।
यही सवाल एक बार भगवान ब्रह्मा के बेटे सनत कुमारों ने भगवान शिव किया था तो भगवान शिव ने कहा कि दक्ष की बेटी सती ने योगाग्नि से अपने शरीर को त्यागने से पहले शिव को हर जन्म में पति के रूप में पाने का प्रण लिया था और फिर अपने प्राण त्यागे और अपने प्रण के मुताबिक माता सती ने महाराज हिमालय और रानी मैनावती के यहां बेटी के रुप जन्म लिया।
माता पार्वती ने छोटी उम्र में ही सावन के महीने में भगवान शिव की घोर तपस्या की और भगवान शिव को प्रसन्न किया था। सावन के महीने में ही माता पार्वती और भगवान शिव की शादी हुई थी। इस दिन को हम सभी सावन में महा शिवरात्रि के रूप मे बहुत धूम धाम से मनाते हैं। इसीलिए तब से लेकर अब तक भगवान शिव को सावन का महीना अति प्रिय है।
कहतें हैं कि जो भी सच्चे मन से सावन के महीने में भगवान शिव की पूजा करते हैं तो भगवान शिव उनकी हर मनोकामना पूरी करते हैं। शिव पुराण के अनुसार सावन का महीना बहुत ही पवित्र होता है।इस पवित्र महीने में की गई भगवान शिव की पूजा का फल एक साल की गई पूजा के फल के बराबर होता है। वैसे तो हर सोमवार को भगवान शिव की पूजा फल दायक होती लेकिन सावन के पवित्र महीने में सोमवार की पूजा और व्रत बहुत ही महत्व है।माना जाता है कि जो कोई सावन में सोमवार के दिन भगवान शिव पर मात्र एक बेल पत्र चढ़ा देता है तो उसे सौ अस्वमेध यग्य के बराबर पुण्य का फल मिलता है।जो लोग अपने पूरे परिवार के साथ मिलकर सावन सोमवार को शिव जी का रूद्राभिषेक करते हैं भगवान शिव उनके पूरे परिवार को आजीवन सुखसमृद्धि का वरदान देते हैं।
सावन का पवित्र महीना कुआंरी कन्याओं बहुत ही खास है। जिस प्रकार माता पार्वती ने सावन के महीने में भगवान शिव को अपने तप और व्रत से भगवान शिव को प्रसन्न करके उनसे मनवांच्छित पति का वरदान प्राप्त कर उनसे विवाह किया। उसी प्रकार कुआंरी लड़कियां सावन सोमवार का व्रत करके भगवान शिव से मनचाहा वर का फल प्राप्त करती हैं।

कश्मीर में नहीं बचेगा कोई तिरंगा थामने वाला – महबूबा मुफ्ती

जम्मू-कश्मीर की सीएम महबूबा मुफ्ती ने कहा कि अगर आर्टिकल 35A में छेड़छाड़ की गई तो कश्मीर में ऐसा कोई नहीं बचेगा जो तिरंगे को पकड़ सके। यानि कश्मीरियों के विशेषाधिकारों से छेड़छा़ड़ करने पर तिरंगे को थामने वाला कोई नहीं होगा। महबूबा ने यह भी कहा कि उनके लिए इंदिरा गांधी ही भारत हैं।

महबूबा ने कहा कि हो सकता है कि यह बात कई लोगों को अच्छी न लगे लेकिन इंदिरा भारत थीं। उन्होंने कहा कि जब वो आगे बढ़ रही थीं तब इंदिरा मेरे लिए भारत का प्रतिनिधित्व कर रही थीं।

महबूबा ने यह भी कहा कि एक तरफ हम संविधान के दायरे में कश्मीर मुद्दे का समाधान करने की बात करते हैं और दूसरी तरफ हम इस पर हमला करते हैं। इस तरह से कश्मीर मुद्दे का समाधान नहीं निकाला जा सकता। महबूबा ने कहा कि मेरे जैसी तमाम पार्टियां जो जोेखिम के बाद भी राष्ट्रीय ध्वज हाथ में रखती हैं, अगर आर्टिकल में बदलाव किया गया, तो कोई तिरंगे को हाथ भी नहीं लगाएगा।

मस्त रहो अपनी भक्ति की चरस में — अभिसार शर्मा

कटघरे में अभिव्यक्ति

— अभिसार शर्मा

चोटिल हूँ, लिहाजा कुछ दिनों से लिख नहीं पा रहा हूँ। हाथ टूट गया है। बडी हिम्मत करके कुछ लिख रहा हूँ। खुद बेबस हूँ, और मेरा पेशा, यानि पत्रकारिता मुझसे भी ज़्यादा बेबस। मेरा तो सिर्फ हाथ टूटा है, मगर मौजूदा पत्रकारिता के हाथ पैर पीछे से या तो बांध दिये गये हैं या तोड़ दिये गये हैं या फिर कुछ ने तो अपनी कलम सौंप दी है। इसे Emotional अत्याचार ना समझें, मगर सोचें ज़रूर! मामला वरिष्ठ पत्रकार परंजॉय गुहा ठाकुरता के इस्तीफे का है।1 उन्होंने इस्तीफा इसलिये दिया या दिलवाया गया क्योंकि उनकी पत्रिका Economic & Political Weekly के board of directors ने, जो पत्रिका का ट्रस्ट चलाते हैं, उन्हे ये आदेश दिया कि Adani business समूह के बारे में लिखे गये दो लेखों को हटाये। Adani गुट पहले ही मानहानी का मुकदमा ठोंकने का नोटिस भेज चुका था। अगर लेख इतने कमजोर थे, तो क्या उन्हें छापने से पहले हकीकत की कसौटी पर परखा नहीं गया था? और अगर विश्वास था तो किस बात का डर? दरअसल, डर सिर्फ मानहानी का नहीं, बल्कि प्रक्रिया का है। फैसला तो जब आयेगा तब आयेगा। मगर उससे पहले महंगी न्यायिक प्रक्रिया से कौन गुजरे। अब प्रक्रिया ही सजा है। Media house पे छापा मार दो, चाटुकार टीवी चैनलों में उसे जम कर उछाल दें, आधा काम वही हो जाता है। ये वो काल है जब मामले की सत्यता मायने नहीं रखती, बस शोर होना चाहिये। झूठ भी चीख चीख कर बोलो। कचरा सोच जनता मान ही लेगी। यह वही जनता है जो मोदीजी की काया से चौंधियाई हुई है। उनके वादों पे कोई जवाब नहीं चाहिये। इसका पेट शब्दों से भर जाता है। और क्या जनता और क्या पत्रकार। तीन साल बाद अब भी सारे सवालों के जवाब, विपक्ष से चाहिये। थकी मरी opposition से। ऐसे पत्रकार कैसे करेंगे सवाल एक ऐसी सरकार से, जो सिर्फ चतुराई से मुद्दों को भटकाना जानती है। ना किसानों पे सवाल, ना शहीद सैनिकों के बढ़ते जनाजों पर सवाल, ना नौकरियों पे सवाल।

मोदीजी गाय के नाम पर हो रही हत्याओं पर बोलते हैं मगर अपनी शर्तों पर। Media का कोई दबाव नहीं था उनपर। तीन साल पूरा होने पर कितने पत्रकारों ने इस सरकार और उसकी नाकामी पर उसे कटघरे मे खड़ा किया?

हम यानि पत्रकार खाते हैं अपनी विश्वसनीयता की। अपनी image की। भक्ति काल में हमने इसे ही दांव पे लगा दिया है। चाहे डर, या मौजूदा प्रधान सेवकजी से मंत्रमुग्ध होने के चलते, हमने वो सवाल पूछने बंद कर दिये हैं। अधिकतर media में मुद्दे गायब हैं। और जब सवाल नहीं पूछे जाते या उसकी ज़रूरत नहीं महसूस होती तो फिर ऐसा ही corporate आतंक सामने आता है। जब सम्पादक कमजोर हो जाता है और “मालिक” दिशा तय करता है। अगले सप्ताह supreme court को फैसला करना है के निजता यानि privacy एक बुनियादी अधिकार है या सामान्य अधिकार। मोदी सरकार इसे बुनियादी अधिकार नहीं मानती। हैरानी नहीं है मुझे। ये बात अलग है के सामान्य नागरिकों और समय पर कर्ज न चुकाने वाले धन्ना सेठों के लिये इस सरकार के लिये निजता के अधिकार के मायने बदल जाते हैं। आज आपकी “निजता” कटघरे में है, कल आपके विचारों की अभिव्यक्ति के अधिकार की बारी हो सकती है।

मस्त रहो अपनी भक्ति की चरस में।

केजरीवाल की राह पर मोदी

केंद्र सरकार ने बहुत समय से लंबित राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति को अमली जामा पहना दिया है जो यदि अच्छे से लागू हुई तो आम जनता विशेषकर गरीब लोगों को बहुत राहत मिलेगी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में कैबिनेट ने 15 मार्च 2017 को नई राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति को मंजूरी प्रदान की यह एक राष्ट्रीय नीति है जिसके तहत देश के नागरिक विभिन्न रोगों के लिए सरकारी एवं निजी अस्पतालों में निःशल्क एवं सामान्य व्यय पर इलाज करा सकेंगे, इस स्वास्थ्य नीति में सभी के लिए निःशल्क स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराना सरकार की जिम्मेदारी बताया गया है इस में यह भी स्पष्ट किया गया है कि इसे सुचना या भोजन के अधिकार की तरह लोगों का अधिकार घोषित नहीं किया जाएगा ।

सरकारी योजनाओं के तहत विशेषज्ञ और शीर्ष स्तरीय इलाज में अब निजी क्षेत्र की भागेदारी को बढ़ाया जाएगा इस योजना के मुख्य बिंदु इस प्रकार है –
प्राथमिक चिकित्सा के लिये निःशुल्क सुविधाएँ मुहैया कराई जायेंगी किसी विशेषज्ञ को दिखाने के लिए लोगों के पास सरकारी या निजी अस्पताल में जाने की छूट होगी स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत निजी अस्पतालों को लोगों इलाज के लिए तय रकम दी जाएगी
स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च को बढाकर सकल घरेलू उत्पाद का 25 प्रतिशत किया जायेगा वर्तमान में यह दर 104 प्रतिशत है
भारत का कोई भी नागरिक जिस भी अस्पताल में चाहे अपना इलाज करवा सकेगा।

निजी अस्पतालों को इस योजना के साथ जोड़ने पर यह लाभ होगा कि नए ढांचे खड़े करने पर धन खर्च नहीं करना पड़ेगा
इस समय देश डॉक्टरों को दिखाने में 80 प्रतिशत और अस्पताल में भर्ती होने के मामले में 60 प्रतिशत हिस्सा निजी अस्पतलों का है निजी अस्पतालों इलाज कराने का खर्चा रोगी को स्वयं उठाना पड़ता है लेकिन नयी नीति आने के बाद यह खर्चा केंद्र सरकार उठाएगी यहाँ एक और बात उल्लेखनीय है की केंद्र सरकार से पहले दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार दिल्ली के सभी निवासियों को पहले से मुफ्त इलाज की सुविधा उपलब्ध करा रही है, दिल्ली सरकार के अन्तर्गत आने वाले अस्पतालों में न सिर्फ दवाइयाँ मुफ्त मिलती हैं बल्कि MRI, CT SCAN जैसी जाँचों के लिए और शल्य चिकित्सा के लिए भी 41 निजी अस्पतालों से अनुबंध दिल्ली सरकार ने किया है ताकि हर कोई अच्छी चिकित्सा एवं मुफ्त चिकित्सा प्राप्त कर सके वहीँ केंद्र सरकार की इस नीति में एकदम मुफ्त चिकित्सा का प्रावधान नहीं है परंतु इसे एक सराहनीय कदम कहा जा सकता है। राज्यों के लिए इस नीति को मानना जरुरी नहीं होगा।