सुप्रीम कोर्ट से मोदी सरकार को झटका

आज का सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला मोदी सरकार के लिए एक बहुत बड़ा झटका है, क्यूँकि मोदी सरकार सुप्रीम कोर्ट में निजता के अधिकार का विरोध कर रही थी। इतना ही नहीं सरकार की तरफ से भारत के अटॉर्नी जर्नल ने दलील देते हुए कहा था की निजता का अधिकार भारत जैसे अविकसित देशों के नागरिकों के लिए मायने नहीं रखता, यह तो अमेरिका या कनाडा जैसे विकसित देशों के नागरिकों के लिए है या फिर निजता का अधिकार उन लोगों को चाहिए जो गलत काम करते हैं।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की सभी दलीलें दरकिनार करते हुए आज गुरुवार(24 अगस्त) को बड़ा फैसला सुनाते हुए निजता के अधिकार को भारत के संविधान के तहत मौलिक अधिकार घोषित किया।प्रधान न्यायाधीश जे. एस. खेहर की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने फैसले में कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 (जीने के अधिकार) के तहत दिए गए अधिकारों के अंतर्गत प्राकृतिक रूप से निजता का अधिकार संरक्षित है। इससे पहले, प्रधान न्यायाधीश जगदीश सिंह खेहर की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने इस सवाल पर तीन सप्ताह के दौरान करीब छह दिन तक सुनवाई की थी कि क्या निजता के अधिकार को संविधान में प्रदा एक मौलिक अधिकार माना जा सकता है। यह सुनवाई दो अगस्त को पूरी हुयी थी। सुनवाई के दौरान निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार में शामिल करने के पक्ष और विरोध में दलीलें दी गयीं।

मुख्य न्यायधीश के अतिरिक्त संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति चेलामेर, न्यायमूर्ति एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति आर के अग्रवाल, न्यायमूर्ति आर एफ नरीमन, न्यायमूर्ति ए एम सप्रे, न्यायमूर्त डी वाई चन्द्रचूड, न्यायमूर्त संजय किशन कौल और न्यायमूर्त एस अब्दुल नजीर शामिल हैं और उन्होंने भी समान विचार व्यक्त किए।

स मुद्दे पर सुनवाई के दौरान अटार्नी जनरल के के वेणुगोपाल, अतिरक्त सालिसीटर जनरल तुषार मेहता, वरिष्ठ अधिवक्ता सर्वश्री अरविन्द दातार, कपिल सिब्बल, गोपाल सुब्रमणियम, श्याम दीवान, आनंद ग्रोवर, सी ए सुन्दरम और राकेश द्विवेदी ने निजता के अधिकार को मौलिक अधिकारों में शामिल करने या नही किये जाने के बारे में दलीलें दीं और अनेक न्यायिक व्यवस्थाओं का हवाला दिया था।

निजता के अधिकार का मुद्दा केन्द्र सरकार की तमाम समाज कल्याण योजनाओं का लाभ प्राप्त करने के लिये आधार को अनिवार्य करने संबंधी केन्द्र सरकार के कदम को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान उठा था। शुरू में तीन न्यायाधीशों की खंडपीठ ने सात जुलाई को कहा था कि आधार से जुड़े सारे मुद्दों पर वृहद पीठ को ही निर्णय करना चाहिए और प्रधान न्यायाधीश इस संबंध में संविधान पीठ गठित करने के लिये कदम उठायेंगे।